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Category: हास्य कविता

Hasya Kavita in Hindi | हास्य कविता हिंदी में

सवाल में बवाल 

 रिंग रोड पर मिल गए नेता जी बलवीर ।
कुत्ता उनके साथ था पकड़ रखी ज़ंजीर ॥
पकड़ रखी जंजीर अल्सेशियन था वह कुत्ता ।
नेता से दो गुना भौंकने का था बुत्ता ॥
हमने पूछा, कहो, आज कैसे हो गुमसुम ।
इस गधे को लेकर कहाँ जा रहे हो तुम ॥
नेता बोले क्रोध से करके टेढ़ी नाक ।
कुत्ता है या गधा है, फूट गईं हैं आँख ॥
फूट गईं हैं आँख, नशा करके आए हो ।
बिना बात सुबह-सुबह लड़ने आए हो ॥
हमने कहा कि कौन आपसे जूझ रहे हैं ।
यह सवाल तो हम कुत्ते से पूछ रहे हैं ॥

गुड मोर्निंग

अगर सुबह उठ कर उसे गुड मोर्निंग किये जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम…

अगर वो तुम्हे जानू, और बैबी तुम उसे कहे जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम…

एक बेचलर की तरह, तुम भी कुछ कहना सीखो,
एक शेर की तरह तुम भी अपने घर में रहना सीखो.
मत डरो इस बात से कि, लगेगी वो तुम्हें डाटने,
हर एक बात को कह दो, तुम सीधा उसके सामने…

मनमोहन की तरह बिना बात के मुस्कुराए जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम….
अपनी बीवी की हर हाँ, में हाँ मिलाए जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम…

 

क्लिष्ट :

क्लिष्ट !

गूढ़ !

उलझी हुई !

मुश्किल !

पेचीदा !

मगर दिलचस्प !

उर्दू शायरी की तरह तुम, प्रिय !

समझ में तो,

कम ही आती हो,

मगर,

पढ़ने में तुम्हें ,

मज़ा बहुत आता है !

कुल मिला कर,

कुछ खास,

पल्ले तो नहीं पड़ता,

मगर,
कोशिशों में,

समझने के,

प्रयासों में तुम्हें,
वक़्त तुम्हारे साथ,

अपना खूब कट जाता है !

 

बच के कहाँ जाओगी रानी  :

बच के कहाँ जाओगी रानी !

हमसा कहाँ पाओगी रानी !
इतने दिनों से नज़र है तुझपे,
रोच गच्चा दे जाती है !
आज तो मौका हाथ आया है !
बस तुम हो और,
बस मैं हूँ, बस !
बंद अकेला और कमरा है !
इतने दिनों से सोच रहा हूँ,
अपने अरमां उड़ेल दूँ,
सारे तुझ पर ,
आज तू अच्छी हाथ आई है !

करूँगा सारे मंसूबे पूरे !

आज तो चाहे जो हो जाए,
छोड़ूगा नहीं,
ऐ सोच !
तुझे,
कविता बनाए बिना !!!

 

राम बनने की प्रेरणा

‘पत्नी जी!
मैं छोरा नैं राम बनने की प्रेरणा दे रियो ऊँ
कैसो अच्छो काम कर रियो ऊँ!’
वा बोली-‘मैं जाणूँ हूँ थैं छोरा नैं
राम क्यूँ बणाणा चाहो हो
अइयां दसरथ बणकै तीन घरआली लाणा चाहो हो!’

– सुरेन्द्र शर्मा

 

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा रावण हो या राम,
जनता तो बेचारी सीता है
रावण राजा हुआ
तो वनवास से चोरी चली जाएगी
और राम राजा हुआ
तो अग्नि परीक्षा के बाद
फिर वनवास में भेज दी जाएगी।

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा कौरव हो या पांडव,
जनता तो बेचारी द्रौपदी है
कौरव राजा हुए
तो चीर हरण के काम आएगी
और पांडव राजा हुए
तो जुए में हार दी जाएगी।

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा हिन्दू हो या मुसमान,
जनता तो बेचारी लाश है,
हिन्दू राजा हुआ
तो जला दी जाएगी
और मुसलमान राजा हुआ
तो दफना दी जाएगी।

 

#

एक दिन म्हारी घराड़ी बोल्ली –
ऐ जी, पड़ोसी की चौथी घराड़ी मरगी
ते शमशान घाट हो आओ
मैं बोल्यो – मैं को नी जाऊं
मैं ओके घरा तीन बार हो आयो
वो एक बार भी नहीं आयो…

#

 

‘पत्नी जी!
मेरो इरादो बिल्कुल ही नेक है
तू सैकड़ा में एक है।’
वा बोली-
‘बेवकूफ मन्ना बणाओ
बाकी निन्याणबैं कूण-सी हैं
या बताओ।’

– सुरेन्द्र शर्मा

 

बचाओ

नदी में डूबते आदमी ने
पुल पर चलते आदमी को
आवाज लगाई- बचाओ,

पुल पर चलते आदमी ने
रस्सी नीचे गिराई
और कहा,, “आओ”,

नीचे वाला आदमी
रस्सी पकड़ नहीं पा रहा था
और रह-रहकर चिल्ला रहा था,

मैं मरना नहीं चाहता बड़ी महंगी ये जिंदगी है
कल ही तो एबीसी कंपनी में मेरी नौकरी लगी है.

इतना सुनते ही पुल वाले आदमी ने
रस्सी ऊपर खींच ली और उसे मरता देख
अपनी आंखें मींच ली…..

दौड़ता-दौड़ता एबीसी कंपनी पहुंचा
और हांफते-हांफते बोला…

अभी-अभी आपका एक आदमी डूब के मर गया है
इस तरह वो, आपकी कंपनी में एक जगह खाली कर गया है,
ये मेरी डिग्रियां संभालें बेरोजगार हूं,
उसकी जगह मुझे लगा लें…”

 

ऑफिसर ने हंसते हुए कहा
भाई, तुमने आने में तनिक देर कर दी…..
ये जगह तो हमने अभी दस मिनिट पहले ही भर दी..

और इस जगह पर हमने उस आदमी को लगाया है….
जो उसे धक्का देकर तुमसे दस मिनिट पहले यहां आया है.. 😂😂😂

 

जंगल में बंगले, बंगले ही बंगले
नए नए बनते गए, बंगले ही बंगले..

बंगलों में चारों ओर, जंगले ही जंगले
छोटे-छोटे बड़े-बड़े जंगले ही जंगले…

जंगल से काटी गई, लकड़ी ही लकड़ी,
चीरी गई पाटी गई लकड़ी ही लकड़ी….

चौखट में द्वारों में, लकड़ी ही लकड़ी
फ़र्शों दीवारों में लकड़ी ही लकड़ी…

मानुस ने मार बड़ी, मारी जी मारी,
लकड़ी से तगड़ी थी आरी जी आरी।

आरी के पास न थीं आंखें जी आंखें,
कटती गईं कटती गईं शाखें ही शाखें…

बढ़ते गए बढ़ते गए, बंगले ही बंगले,
जंगल जी होते गए कंगले ही कंगले…

हरा रंग छोड़ छाड़, भूरा भूरा रंग ले,
जंगल जी कंगले या बंगले जी कंगले ?

 

पत्नी जी!
जै मैं ऊ युग में
महाराणा परताप होत्तो
तो के होत्तो?
वा बोल्ली –
महाराणा परताप को घोड़ो चेत्तक
खुद मरने की जगा
थारा ही पराण ले लेत्तो!

– सुरेंद्र शर्मा

 

मैं जब शेर का शिकार कर घर पहुंचो
तो पत्नी से कही –
देख, शेर की खाल लाया हूं
पर आज तो गजब ही हो जातो
एक मौको एेसो आयो थो
कि शेर मने ही खा जातो
घराड़ी बोली –
ऐसो हो जातो तो मैं तो बरबाद ही हो जाती
थारी तो खाल भी काम नहीं आती।

– सुरेंद्र शर्मा

 

‘काका’ वेटिंग रूम में फंसे देहरादून।
नींद न आई रात भर, मच्छर चूसे खून॥
मच्छर चूसे खून, देह घायल कर डाली।
हमें उड़ा ले ज़ाने की योजना बना डाली॥
किंतु बच गए कैसे, यह बतलाए तुमको ।
नीचे खटमल जी ने पकड़ रखा था हमको ॥

हुई विकट रस्साकशी, थके नहीं रणधीर।
ऊपर मच्छर खींचते नीचे खटमल वीर॥
नीचे खटमल वीर, जान संकट में आई।
घिघियाए हम- “जै जै जै हनुमान गुसाईं॥
पंजाबी सरदार एक बोला चिल्लाके –
त्व्हाणूँ पजन करना होवे तो करो बाहर जाके॥

– काका हाथरसी, हास्य कवि

 

डरते झिझकते
सहमते सकुचाते
हम अपने होने वाले
ससुर जी के पास आए,
बहुत कुछ कहना चाहते थे
पर कुछ
बोल ही नहीं पाए।

वे धीरज बँधाते हुए बोले-
बोलो!
अरे, मुँह तो खोलो।

 

ससुर जी उवाच

डरते झिझकते
सहमते सकुचाते
हम अपने होने वाले
ससुर जी के पास आए,
बहुत कुछ कहना चाहते थे
पर कुछ
बोल ही नहीं पाए।

वे धीरज बँधाते हुए बोले-
बोलो!
अरे, मुँह तो खोलो।

हमने कहा-
जी. . . जी
जी ऐसा है
वे बोले-
कैसा है?

हमने कहा-
जी. . .जी ह़म
हम आपकी लड़की का
हाथ माँगने आए हैं।

वे बोले
अच्छा!
हाथ माँगने आए हैं!
मुझे उम्मीद नहीं थी
कि तू ऐसा कहेगा,
अरे मूरख!
माँगना ही था
तो पूरी लड़की माँगता
सिर्फ़ हाथ का क्या करेगा?

-अशोक चक्रधर

  

नेता जी लगे मुस्कुराने 

एक महा विद्यालय में
नए विभाग के लिए
नया भवन बनवाया गया,
उसके उद्घाटनार्थ
विद्यालय के एक पुराने छात्र
लेकिन नए नेता को
बुलवाया गया।

अध्यापकों ने
कार के दरवाज़े खोले
नेती जी उतरते ही बोले—
यहां तर गईं
कितनी ही पीढ़ियां,
अहा !
वही पुरानी सीढ़ियां !
वही मैदान
वही पुराने वृक्ष,
वही कार्यालय
वही पुराने कक्ष।
वही पुरानी खिड़की
वही जाली,
अहा, देखिए
वही पुराना माली।

मंडरा रहे थे
यादों के धुंधलके
थोड़ा और आगे गए चल के—
वही पुरानी
चिमगादड़ों की साउण्ड,
वही घंटा
वही पुराना प्लेग्राउण्ड।
छात्रों में
वही पुरानी बदहवासी,
अहा, वही पुराना चपरासी।
नमस्कार, नमस्कार !
अब आया हॉस्टल का द्वार—
हॉस्टल में वही कमरे
वही पुराना ख़ानसामा,
वही धमाचौकड़ी
वही पुराना हंगामा।
नेता जी पर
पुरानी स्मृतियां छा रही थीं,
तभी पाया
कि एक कमरे से
कुछ ज़्यादा ही
आवाज़ें आ रही थीं।
उन्होंने दरवाजा खटखटाया,
लड़के ने खोला
पर घबराया।
क्योंकि अंदर एक कन्या थी,
वल्कल-वसन-वन्या थी।
दिल रह गया दहल के,
लेकिन बोला संभल के—
आइए सर !
मेरा नाम मदन है,
इससे मिलिए
मेरी कज़न है।

नेता जी लगे मुस्कुराने
WAHI PURANE BAHANE

-अशोक चक्रधर

ख़लीफ़ा की खोपड़ी

दर्शकों का नया जत्था आया
गाइड ने उत्साह से बताया—
ये नायाब चीज़ों का
अजायबघर है,
कहीं परिन्दे की चोंच है
कहीं पर है।
ये देखिए
ये संगमरमर की शिला
एक बहुत पुरानी क़बर की है,
और इस पर जो बड़ी-सी
खोपड़ी रखी है न,
ख़लीफा बब्बर की है।
तभी एक दर्शक ने पूछा—
और ये जो
छोटी खोपड़ी रखी है
ये किनकी है ?
गाइड बोला—
है तो ये भी ख़लीफ़ा बब्बर की
पर उनके बचपन की है।

-अशोक चक्रधर

हंसो और मर जाओ

हंसो, तो
बच्चों जैसी हंसी,
हंसो, तो
सच्चों जैसी हंसी।
इतना हंसो
कि तर जाओ,
हंसो
और मर जाओ।
हँसो और मर जाओ

चौथाई सदी पहले
लगभग रुदन-दिनों में
जिनपर
हम
हंसते-हंसते मर गए
उन
प्यारी बागेश्री को
समर-पति की ओर
स-समर्पित

श्वेत या श्याम
छटांक का ग्राम
धूम या धड़ाम
अविराम या जाम,
जैसा भी है
ये था उन दिनों का-
काम

-अशोक चक्रधर

ओज़ोन लेयर

पति-पत्नी में
बिलकुल नहीं बनती है,
बिना बात ठनती है।
खिड़की से निकलती हैं
आरोपों की बदबूदार हवाएं,
नन्हे पौधों जैसे बच्चे
खाद-पानी का इंतज़ाम
किससे करवाएं ?

होते रहते हैं
शिकवे-शिकायतों के
कंटीले हमले,
सूख गए हैं
मधुर संबंधों के गमले।
नाली से निकलता है
घरेलू पचड़ों के कचरों का
मैला पानी,
नीरस हो गई ज़िंदगानी।
संबंध
लगभग विच्छेद हो गया है,
घर की ओज़ोन लेयर में
छेद हो गया है।

सब्ज़ी मंडी से
ताज़ी सब्ज़ी लाए गुप्ता जी
तो खन्ना जी मुरझा गए,
पांडे जी
कृपलानी के फ़्रिज को
आंखों-ही-आंखों में खा गए
जाफ़री के
नए-नए सोफ़े को
काट गई
कपूर साहब की
नज़रों की कुल्हाड़ी,
सुलगती ही रहती है
मिसेज़ लोढ़ा की
ईर्ष्या की काठ की हांडी।

सोने का सैट दिखाया
सरला आंटी ने
तो कट के रह गईं
मिसेज़ बतरा,
उनकी इच्छाओं की क्यारी में
नहीं बरसता है
ऊपर की कमाई के पानी का
एक भी क़तरा।

मेहता जी का
जब से प्रमोशन हुआ है,
शर्मा जी के अंदर कई बार
ज़बर्दस्त भूक्षरण हुआ है।
बीहड़ हो गई है
आपस की राम-राम,
बंजर हो गई है
नमस्ते दुआ सलाम।

बस ठूंठ-जैसा
एक मक़सद-विहीन सवाल है—
‘क्या हाल है ?’
जवाब को भी जैसे
अकाल ने छुआ है
मुर्दनी अंदाज़ में—
‘आपकी दुआ है।’

अधिकांश लोग नहीं करते हैं
चंदा देकर
एसोसिएशन की सिंचाई,
सैक्रेट्री
प्रैसीडेंट करते रहते हैं
एक दूसरे की खिंचाई।
खुल्लमखुल्ला मतभेद हो गया है,
कॉलोनी की ओज़ोन लेयर में
छेद हो गया है।

बरगद जैसे बूढ़े बाबा को
मार दिया बनवारी ने
बुढ़वा मंगल के दंगल में,
रमतू भटकता है
काले कोटों वाली कचहरी के
जले हुए जंगल में।
अभावों की धूल
और अशिक्षा के धुएं से
काले पड़ गए हैं
गांव के कपोत
सूख गए हैं

चौधरियों की उदारता के
सारे जलस्रोत।
उद्योग चाट गए हैं
छोटे-मोटे धंधे,
कमज़ोर हो गए हैं
बैलों के कंधे।
छुट्टल घूमता है
सरपंच का बिलौटा,
रामदयाल
मानसून की तरह
शहर से नहीं लौटा।

सुजलाम् सुफलाम्
शस्य श्यामलाम् धरती जैसी
अल्हड़ थी श्यामा।
सब कुछ हो गया
लेकिन न शोर हुआ
न हंगामा।
दिल दरक गया है
लाखों हैक्टेअर
परती धरती की तरह
श्यामा का चेहरा
सफ़ेद हो गया है,
गांव की ओज़ोन लेयर में
छेद हो गया है।

-अशोक चक्रधर

 

Hasya Kavita in Hindi | हास्य कविता हिंदी में

Hasya Kavita in Hindi | हास्य कविता हिंदी में

Hasya Kavita in Hindi

 

Hasya Kavita in Hindi : आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में हंसी कहीं गुम सी हो गयी है | हंसना, हँसाना , मजाक – मस्ती सब समय के साथ खत्म या बेहद कम हो जाती है | हंसी बचपन की यादों के साथ कहीं गुम हो जाती है | आज हर इंसान अपनी जीवन में इतना व्यस्त हो गया है कि वह खुद के लिए भी समय नहीं निकाल पाता है | पहले समय में जब टेक्नोलॉजी ज्यादा विकसित नहीं थी तब लोग आपस में घुलते मिलते थे , आपस में बाते किया करते थे , हंसी मजाक का माहौल रहता था | चारो तरफ खुशनुमा माहौल बना रहता था | टेक्नोलॉजी के विकसित होने के साथ यह सब विलुप्त होती गयी | आज सिर्फ गाँवों में ही यह सब देखने को मिलता है | वरना शहर के लोग तो रोबोट की तरह काम करते हैं | औरों से मिलने का समय ही कहाँ मिलता है साहब !

अगर आप अपने बचपन को याद करेंगे तो पाएंगे कि पहले का समय सबसे अच्छा था | तब बड़े बुजुर्ग एक जगह पर इक्कठा होकर आपस में बाते किया किया करते थे | एक दूसरे को हास्य कविताएं सुनाया करते थे | आज भी लोग इंटरनेट पर Hasya Kavita  को ढूंढ़ते रहते है | हम आप सबकी समस्या को समझते हैं | उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए हम यहाँ आपके लिए लायें हैं Hasya Kavita in Hindi का संग्रह, इन हास्य कविता को पढ़िए और खुल कर हँसिए |

हमारा इस वेबसाइट के द्वारा यह प्रयास रहता है की आपको हम अधिक से अधिक कवितायें उपलब्ध करवायें | अगर आपके पास भी हास्या कविताओं का संग्रह है और अगर आप उसे हमारे पाठकों के साथ सांझा करना चाहते हैं तो हमसे कॉंटॅक्ट करें | हम आपकी कविता आपके नाम के साथ पब्लिश करेंगे |

Hasya kavita in Hindi

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Hasya Kavita in Hindi

एक कवि-सम्मेलन में
‘नेता जी’ मुख्य अतिथि के रूप में आये हुए थे,
परन्तु गुस्से के कारण
अपना मुँह फुलाये हुए थे ।
उपस्थित अधिकांश कवि
नेताओं के विरोध में कविता सुना रहे थे,
इसलिए, नेता जी को
बिल्कुल भी नहीं भा रहे थे ।
जब उनके भाषण का नम्बर आया
तो उन्होंने यूँ फ़रमाया-

इस देश में
बिहारी और भूषण की परम्परा का कवि
न जाने कहाँ खो गया है,
अब तो सत्ता की आलोचना करना ही
कवियों का काम हो गया है ।

मैंने कहा-
श्रद्धेय, श्रीमान जी,
हम आज भी करते हैं
आपका पूरा-पूरा सम्मान जी,
लेकिन राजनीति में
अपराधियों की बढ़ती हुई संख्या
एक ही कहानी कह रही है,
ईमानदारों की संख्या तो आजकल
मुश्किल से दो प्रतिशत ही रह रही है ।
जब आप इस प्रतिशत को
उल्टा करके दिखायेंगे,
तो हम भी एक बार फिर से
भूषण और बिहारी की
परम्परा को निभाएंगे ।

आपके सम्मान में गीत गाएंगे,
गीतों में आपका अभिनन्दन करेंगे
आपके चरणों मैं सुबह-शाम वन्दन करेंगे ।

– प्रवीण शुक्ला
साभार – हँसते हँसाते रहो

 

मोटूराम ! मोटूराम !
दिन भर खाते जाए जाम,
पेट को न दे जरा आराम,
मोटूराम ! मोटूराम !
स्कूल जो जाए मोटूराम,
दोस्त सताए खुलेआम,
मोटू, तू है तोंदूराम !
हमारी कमर, तेरा गोदाम !

तैश में आएँ मोटूराम !
भागे पीछे सरेआम,
पर बाकी सब पतलूराम !
पीछे रह जाएँ मोटूराम !

रोते घर आएँ मोटूराम,
सर उठा लें पूरा धाम,
माँ पुचकारे छोटूराम,
मत रो बेटा , खा ले आम !

जब जब रोतें मोटूराम,
तब तब सूते जाए आम,
और करें कुछ, काम न धाम,
मुटियाते जाएँ मोटूराम !

एक दिन पेट में उठा संग्राम !
डाक्टर के पास मोटूराम,
सुई लगी, चिल्लाए ‘ राम’ !
‘ राम, राम ! हाए राम !’

exerciseतब जाने सेहत के दाम,
अब हर रोज़ करें व्यायाम,
धीरे धीरे घटा वज़न,
पतले हो गए मोटूराम !

 

हर साल बड़े-बड़े वादों के साथ आते हैं ये,
हर साल यू ही निराश कर चले जाते हैं ये !
हर बार एक ही बात कह जाते हैं ये,
हर वक्त यही सुनाते हैं ये,
कि बदल कर रख देंगे इस समाज को हमारे लिए ,
हर वक्त यही दावे करते रहते हैं ये!
इनकी बातों में आकर हम अपनी राह से भटक जाते हैं,
इनको अपना बहुमत देकर, बाद में पछताते हैं!
इनके चक्कर में रहकर तो हम झूठ और धोखे ही पाते हैं,
जब कभी होता है हमें इनके झूठ का एहसास ,
तो हम निराश होकर अपने सच्चाई से बने घरौंदो मे लौट आते हैं!
इनकी तो शान झूठी , पहचान झूठी , इनकी तो हर एक बात झूठी,
बदल कर रख देंगे हम इन घूसखोरों को, इनकी तो सरकार झूठी!
– नमिता कुमारी

 

झगड़िये भाय
कुत्ते ज्यों मारे झपट
जूठे के लिए भाय
त्यों हीं आप भी झगड़िये
सत्ता के लिए भाय
झगड़-झगड़ कर लीजिए
सत्ता कभी चलाय
जब बहुमत को खोइए
फिर से कीजिए लड़ाई
दल को सदा मिलाइए
काम सिद्ध हो जाए
राम राज्य के नाम पर
धोखा दीजिए भाय
धोखा सदा हीं दीजिए
काम सिद्ध हो जाए
गुटबाजी के जरिए
फिर सत्ता को पलटाय
सदा-सदा हीं झगड़िये
सत्ता के लिए भाय
– डॉ नारायण मिश्र

 

बच के कहाँ जाओगी रानी :

बच के कहाँ जाओगी रानी !

हमसा कहाँ पाओगी रानी !
इतने दिनों से नज़र है तुझपे,
रोच गच्चा दे जाती है !
आज तो मौका हाथ आया है !
बस तुम हो और,
बस मैं हूँ, बस !
बंद अकेला और कमरा है !
इतने दिनों से सोच रहा हूँ,
अपने अरमां उड़ेल दूँ,
सारे तुझ पर ,
आज तू अच्छी हाथ आई है !

करूँगा सारे मंसूबे पूरे !

आज तो चाहे जो हो जाए,
छोड़ूगा नहीं,
ऐ सोच !
तुझे,
कविता बनाए बिना !!!

सवाल में बवाल 

 रिंग रोड पर मिल गए नेता जी बलवीर ।
कुत्ता उनके साथ था पकड़ रखी ज़ंजीर ॥
पकड़ रखी जंजीर अल्सेशियन था वह कुत्ता ।
नेता से दो गुना भौंकने का था बुत्ता ॥
हमने पूछा, कहो, आज कैसे हो गुमसुम ।
इस गधे को लेकर कहाँ जा रहे हो तुम ॥
नेता बोले क्रोध से करके टेढ़ी नाक ।
कुत्ता है या गधा है, फूट गईं हैं आँख ॥
फूट गईं हैं आँख, नशा करके आए हो ।
बिना बात सुबह-सुबह लड़ने आए हो ॥
हमने कहा कि कौन आपसे जूझ रहे हैं ।
यह सवाल तो हम कुत्ते से पूछ रहे हैं ॥

गुड मोर्निंग

अगर सुबह उठ कर उसे गुड मोर्निंग किये जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम…

अगर वो तुम्हे जानू, और बैबी तुम उसे कहे जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम…

एक बेचलर की तरह, तुम भी कुछ कहना सीखो,
एक शेर की तरह तुम भी अपने घर में रहना सीखो.
मत डरो इस बात से कि, लगेगी वो तुम्हें डाटने,
हर एक बात को कह दो, तुम सीधा उसके सामने…

मनमोहन की तरह बिना बात के मुस्कुराए जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम….
अपनी बीवी की हर हाँ, में हाँ मिलाए जा रहे हो,
तो बर्बाद हो तुम…

 

क्लिष्ट :

क्लिष्ट !

गूढ़ !

उलझी हुई !

मुश्किल !

पेचीदा !

मगर दिलचस्प !

उर्दू शायरी की तरह तुम, प्रिय !

समझ में तो,

कम ही आती हो,

मगर,

पढ़ने में तुम्हें ,

मज़ा बहुत आता है !

कुल मिला कर,

कुछ खास,

पल्ले तो नहीं पड़ता,

मगर,
कोशिशों में,

समझने के,

प्रयासों में तुम्हें,
वक़्त तुम्हारे साथ,

अपना खूब कट जाता है !

 

बच के कहाँ जाओगी रानी  :

बच के कहाँ जाओगी रानी !

हमसा कहाँ पाओगी रानी !
इतने दिनों से नज़र है तुझपे,
रोच गच्चा दे जाती है !
आज तो मौका हाथ आया है !
बस तुम हो और,
बस मैं हूँ, बस !
बंद अकेला और कमरा है !
इतने दिनों से सोच रहा हूँ,
अपने अरमां उड़ेल दूँ,
सारे तुझ पर ,
आज तू अच्छी हाथ आई है !

करूँगा सारे मंसूबे पूरे !

आज तो चाहे जो हो जाए,
छोड़ूगा नहीं,
ऐ सोच !
तुझे,
कविता बनाए बिना !!!

 

राम बनने की प्रेरणा

‘पत्नी जी!
मैं छोरा नैं राम बनने की प्रेरणा दे रियो ऊँ
कैसो अच्छो काम कर रियो ऊँ!’
वा बोली-‘मैं जाणूँ हूँ थैं छोरा नैं
राम क्यूँ बणाणा चाहो हो
अइयां दसरथ बणकै तीन घरआली लाणा चाहो हो!’

– सुरेन्द्र शर्मा

 

कोई फर्क नहीं पड़ता

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा रावण हो या राम,
जनता तो बेचारी सीता है
रावण राजा हुआ
तो वनवास से चोरी चली जाएगी
और राम राजा हुआ
तो अग्नि परीक्षा के बाद
फिर वनवास में भेज दी जाएगी।

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा कौरव हो या पांडव,
जनता तो बेचारी द्रौपदी है
कौरव राजा हुए
तो चीर हरण के काम आएगी
और पांडव राजा हुए
तो जुए में हार दी जाएगी।

कोई फर्क नहीं पड़ता
इस देश में राजा हिन्दू हो या मुसमान,
जनता तो बेचारी लाश है,
हिन्दू राजा हुआ
तो जला दी जाएगी
और मुसलमान राजा हुआ
तो दफना दी जाएगी।

 

शमशान घाट

एक दिन म्हारी घराड़ी बोल्ली –
ऐ जी, पड़ोसी की चौथी घराड़ी मरगी
ते शमशान घाट हो आओ
मैं बोल्यो – मैं को नी जाऊं
मैं ओके घरा तीन बार हो आयो
वो एक बार भी नहीं आयो…

 

‘पत्नी जी!

‘पत्नी जी!
मेरो इरादो बिल्कुल ही नेक है
तू सैकड़ा में एक है।’
वा बोली-
‘बेवकूफ मन्ना बणाओ
बाकी निन्याणबैं कूण-सी हैं
या बताओ।’

– सुरेन्द्र शर्मा

 

बचाओ

नदी में डूबते आदमी ने
पुल पर चलते आदमी को
आवाज लगाई- बचाओ,

पुल पर चलते आदमी ने
रस्सी नीचे गिराई
और कहा,, “आओ”,

नीचे वाला आदमी
रस्सी पकड़ नहीं पा रहा था
और रह-रहकर चिल्ला रहा था,

मैं मरना नहीं चाहता बड़ी महंगी ये जिंदगी है
कल ही तो एबीसी कंपनी में मेरी नौकरी लगी है.

इतना सुनते ही पुल वाले आदमी ने
रस्सी ऊपर खींच ली और उसे मरता देख
अपनी आंखें मींच ली…..

दौड़ता-दौड़ता एबीसी कंपनी पहुंचा
और हांफते-हांफते बोला…

अभी-अभी आपका एक आदमी डूब के मर गया है
इस तरह वो, आपकी कंपनी में एक जगह खाली कर गया है,
ये मेरी डिग्रियां संभालें बेरोजगार हूं,
उसकी जगह मुझे लगा लें…”

 

ऑफिसर ने हंसते हुए कहा
भाई, तुमने आने में तनिक देर कर दी…..
ये जगह तो हमने अभी दस मिनिट पहले ही भर दी..

और इस जगह पर हमने उस आदमी को लगाया है….
जो उसे धक्का देकर तुमसे दस मिनिट पहले यहां आया है.. 😂😂😂

 

जंगल में बंगले, बंगले ही बंगले
नए नए बनते गए, बंगले ही बंगले..

बंगलों में चारों ओर, जंगले ही जंगले
छोटे-छोटे बड़े-बड़े जंगले ही जंगले…

जंगल से काटी गई, लकड़ी ही लकड़ी,
चीरी गई पाटी गई लकड़ी ही लकड़ी….

चौखट में द्वारों में, लकड़ी ही लकड़ी
फ़र्शों दीवारों में लकड़ी ही लकड़ी…

मानुस ने मार बड़ी, मारी जी मारी,
लकड़ी से तगड़ी थी आरी जी आरी।

आरी के पास न थीं आंखें जी आंखें,
कटती गईं कटती गईं शाखें ही शाखें…

बढ़ते गए बढ़ते गए, बंगले ही बंगले,
जंगल जी होते गए कंगले ही कंगले…

हरा रंग छोड़ छाड़, भूरा भूरा रंग ले,
जंगल जी कंगले या बंगले जी कंगले ?

 

पत्नी जी!
जै मैं ऊ युग में
महाराणा परताप होत्तो
तो के होत्तो?
वा बोल्ली –
महाराणा परताप को घोड़ो चेत्तक
खुद मरने की जगा
थारा ही पराण ले लेत्तो!

– सुरेंद्र शर्मा

 

मैं जब शेर का शिकार कर घर पहुंचो
तो पत्नी से कही –
देख, शेर की खाल लाया हूं
पर आज तो गजब ही हो जातो
एक मौको एेसो आयो थो
कि शेर मने ही खा जातो
घराड़ी बोली –
ऐसो हो जातो तो मैं तो बरबाद ही हो जाती
थारी तो खाल भी काम नहीं आती।

– सुरेंद्र शर्मा

 

‘काका’ वेटिंग रूम में फंसे देहरादून।
नींद न आई रात भर, मच्छर चूसे खून॥
मच्छर चूसे खून, देह घायल कर डाली।
हमें उड़ा ले ज़ाने की योजना बना डाली॥
किंतु बच गए कैसे, यह बतलाए तुमको ।
नीचे खटमल जी ने पकड़ रखा था हमको ॥

हुई विकट रस्साकशी, थके नहीं रणधीर।
ऊपर मच्छर खींचते नीचे खटमल वीर॥
नीचे खटमल वीर, जान संकट में आई।
घिघियाए हम- “जै जै जै हनुमान गुसाईं॥
पंजाबी सरदार एक बोला चिल्लाके –
त्व्हाणूँ पजन करना होवे तो करो बाहर जाके॥

– काका हाथरसी, हास्य कवि

 

डरते झिझकते
सहमते सकुचाते
हम अपने होने वाले
ससुर जी के पास आए,
बहुत कुछ कहना चाहते थे
पर कुछ
बोल ही नहीं पाए।

वे धीरज बँधाते हुए बोले-
बोलो!
अरे, मुँह तो खोलो।

 

ससुर जी उवाच

डरते झिझकते
सहमते सकुचाते
हम अपने होने वाले
ससुर जी के पास आए,
बहुत कुछ कहना चाहते थे
पर कुछ
बोल ही नहीं पाए।

वे धीरज बँधाते हुए बोले-
बोलो!
अरे, मुँह तो खोलो।

हमने कहा-
जी. . . जी
जी ऐसा है
वे बोले-
कैसा है?

हमने कहा-
जी. . .जी ह़म
हम आपकी लड़की का
हाथ माँगने आए हैं।

वे बोले
अच्छा!
हाथ माँगने आए हैं!
मुझे उम्मीद नहीं थी
कि तू ऐसा कहेगा,
अरे मूरख!
माँगना ही था
तो पूरी लड़की माँगता
सिर्फ़ हाथ का क्या करेगा?

-अशोक चक्रधर

  

नेता जी लगे मुस्कुराने 

एक महा विद्यालय में
नए विभाग के लिए
नया भवन बनवाया गया,
उसके उद्घाटनार्थ
विद्यालय के एक पुराने छात्र
लेकिन नए नेता को
बुलवाया गया।

अध्यापकों ने
कार के दरवाज़े खोले
नेती जी उतरते ही बोले—
यहां तर गईं
कितनी ही पीढ़ियां,
अहा !
वही पुरानी सीढ़ियां !
वही मैदान
वही पुराने वृक्ष,
वही कार्यालय
वही पुराने कक्ष।
वही पुरानी खिड़की
वही जाली,
अहा, देखिए
वही पुराना माली।

मंडरा रहे थे
यादों के धुंधलके
थोड़ा और आगे गए चल के—
वही पुरानी
चिमगादड़ों की साउण्ड,
वही घंटा
वही पुराना प्लेग्राउण्ड।
छात्रों में
वही पुरानी बदहवासी,
अहा, वही पुराना चपरासी।
नमस्कार, नमस्कार !
अब आया हॉस्टल का द्वार—
हॉस्टल में वही कमरे
वही पुराना ख़ानसामा,
वही धमाचौकड़ी
वही पुराना हंगामा।
नेता जी पर
पुरानी स्मृतियां छा रही थीं,
तभी पाया
कि एक कमरे से
कुछ ज़्यादा ही
आवाज़ें आ रही थीं।
उन्होंने दरवाजा खटखटाया,
लड़के ने खोला
पर घबराया।
क्योंकि अंदर एक कन्या थी,
वल्कल-वसन-वन्या थी।
दिल रह गया दहल के,
लेकिन बोला संभल के—
आइए सर !
मेरा नाम मदन है,
इससे मिलिए
मेरी कज़न है।

नेता जी लगे मुस्कुराने
WAHI PURANE BAHANE

-अशोक चक्रधर

ख़लीफ़ा की खोपड़ी

दर्शकों का नया जत्था आया
गाइड ने उत्साह से बताया—
ये नायाब चीज़ों का
अजायबघर है,
कहीं परिन्दे की चोंच है
कहीं पर है।
ये देखिए
ये संगमरमर की शिला
एक बहुत पुरानी क़बर की है,
और इस पर जो बड़ी-सी
खोपड़ी रखी है न,
ख़लीफा बब्बर की है।
तभी एक दर्शक ने पूछा—
और ये जो
छोटी खोपड़ी रखी है
ये किनकी है ?
गाइड बोला—
है तो ये भी ख़लीफ़ा बब्बर की
पर उनके बचपन की है।

-अशोक चक्रधर

हंसो और मर जाओ

हंसो, तो
बच्चों जैसी हंसी,
हंसो, तो
सच्चों जैसी हंसी।
इतना हंसो
कि तर जाओ,
हंसो
और मर जाओ।
हँसो और मर जाओ

चौथाई सदी पहले
लगभग रुदन-दिनों में
जिनपर
हम
हंसते-हंसते मर गए
उन
प्यारी बागेश्री को
समर-पति की ओर
स-समर्पित

श्वेत या श्याम
छटांक का ग्राम
धूम या धड़ाम
अविराम या जाम,
जैसा भी है
ये था उन दिनों का-
काम

-अशोक चक्रधर

ओज़ोन लेयर

पति-पत्नी में
बिलकुल नहीं बनती है,
बिना बात ठनती है।
खिड़की से निकलती हैं
आरोपों की बदबूदार हवाएं,
नन्हे पौधों जैसे बच्चे
खाद-पानी का इंतज़ाम
किससे करवाएं ?

होते रहते हैं
शिकवे-शिकायतों के
कंटीले हमले,
सूख गए हैं
मधुर संबंधों के गमले।
नाली से निकलता है
घरेलू पचड़ों के कचरों का
मैला पानी,
नीरस हो गई ज़िंदगानी।
संबंध
लगभग विच्छेद हो गया है,
घर की ओज़ोन लेयर में
छेद हो गया है।

सब्ज़ी मंडी से
ताज़ी सब्ज़ी लाए गुप्ता जी
तो खन्ना जी मुरझा गए,
पांडे जी
कृपलानी के फ़्रिज को
आंखों-ही-आंखों में खा गए
जाफ़री के
नए-नए सोफ़े को
काट गई
कपूर साहब की
नज़रों की कुल्हाड़ी,
सुलगती ही रहती है
मिसेज़ लोढ़ा की
ईर्ष्या की काठ की हांडी।

सोने का सैट दिखाया
सरला आंटी ने
तो कट के रह गईं
मिसेज़ बतरा,
उनकी इच्छाओं की क्यारी में
नहीं बरसता है
ऊपर की कमाई के पानी का
एक भी क़तरा।

मेहता जी का
जब से प्रमोशन हुआ है,
शर्मा जी के अंदर कई बार
ज़बर्दस्त भूक्षरण हुआ है।
बीहड़ हो गई है
आपस की राम-राम,
बंजर हो गई है
नमस्ते दुआ सलाम।

बस ठूंठ-जैसा
एक मक़सद-विहीन सवाल है—
‘क्या हाल है ?’
जवाब को भी जैसे
अकाल ने छुआ है
मुर्दनी अंदाज़ में—
‘आपकी दुआ है।’

अधिकांश लोग नहीं करते हैं
चंदा देकर
एसोसिएशन की सिंचाई,
सैक्रेट्री
प्रैसीडेंट करते रहते हैं
एक दूसरे की खिंचाई।
खुल्लमखुल्ला मतभेद हो गया है,
कॉलोनी की ओज़ोन लेयर में
छेद हो गया है।

बरगद जैसे बूढ़े बाबा को
मार दिया बनवारी ने
बुढ़वा मंगल के दंगल में,
रमतू भटकता है
काले कोटों वाली कचहरी के
जले हुए जंगल में।
अभावों की धूल
और अशिक्षा के धुएं से
काले पड़ गए हैं
गांव के कपोत
सूख गए हैं

चौधरियों की उदारता के
सारे जलस्रोत।
उद्योग चाट गए हैं
छोटे-मोटे धंधे,
कमज़ोर हो गए हैं
बैलों के कंधे।
छुट्टल घूमता है
सरपंच का बिलौटा,
रामदयाल
मानसून की तरह
शहर से नहीं लौटा।

सुजलाम् सुफलाम्
शस्य श्यामलाम् धरती जैसी
अल्हड़ थी श्यामा।
सब कुछ हो गया
लेकिन न शोर हुआ
न हंगामा।
दिल दरक गया है
लाखों हैक्टेअर
परती धरती की तरह
श्यामा का चेहरा
सफ़ेद हो गया है,
गांव की ओज़ोन लेयर में
छेद हो गया है।

-अशोक चक्रधर

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