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Category: Amir Khusro Poems

बिन-बूझ पहेली (बहिर्लापिका) / अमीर खुसरो

बिन-बूझ पहेली (बहिर्लापिका) / अमीर खुसरो

बिन-बूझ पहेली (बहिर्लापिका) / अमीर खुसरो

एक नार कुँए में रहे,
वाका नीर खेत में बहे।
जो कोई वाके नीर को चाखे,
फिर जीवन की आस न राखे।।

उत्तर – तलवार

एक जानवर रंग रंगीला,
बिना मारे वह रोवे।
उस के सिर पर तीन तिलाके,
बिन बताए सोवे।।

उत्तर – मोर।

चाम मांस वाके नहीं नेक,
हाड़ मास में वाके छेद।
मोहि अचंभो आवत ऐसे,
वामे जीव बसत है कैसे।।

उत्तर – पिंजड़ा।

स्याम बरन की है एक नारी,
माथे ऊपर लागै प्यारी।
जो मानुस इस अरथ को खोले,
कुत्ते की वह बोली बोले।।

उत्तर – भौं (भौंए आँख के ऊपर होती हैं।)

एक गुनी ने यह गुन कीना,
हरियल पिंजरे में दे दीना।
देखा जादूगर का हाल,
डाले हरा निकाले लाल।

उत्तर – पान।

एक थाल मोतियों से भरा,
सबके सर पर औंधा धरा।
चारों ओर वह थाली फिरे,
मोती उससे एक न गिरे।

उत्तर – आसमान


बिन बूझ पहेली या बहिर्लापिका, इसका उत्तर पहेली से बाहर होता है।

ढकोसले या अनमेलियाँ / अमीर खुसरो

ढकोसले या अनमेलियाँ / अमीर खुसरो

ढकोसले या अनमेलियाँ / अमीर खुसरो

भार भुजावन हम गए, पल्ले बाँधी ऊन।
कुत्ता चरखा लै गयो, काएते फटकूँगी चून।।

काकी फूफा घर में हैं कि नायं, नायं तो नन्देऊ
पांवरो होय तो ला दे, ला कथूरा में डोराई डारि लाऊँ।।

खीर पकाई जतन से और चरखा दिया जलाय।
आयो कुत्तो खा गयो, तू बैठी ढोल बजाय, ला पानी पिलाय।

भैंस चढ़ी बबूल पर और लपलप गूलर खाय।
दुम उठा के देखा तो पूरनमासी के तीन दिन।।

पीपल पकी पपेलियाँ, झड़ झड़ पड़े हैं बेर।
सर में लगा खटाक से, वाह रे तेरी मिठास।।

लखु आवे लखु जावे, बड़ो कर धम्मकला।
पीपर तन की न मानूँ बरतन धधरया, बड़ो कर धम्मकला।।

भैंस चढ़ी बबूल पर और लप लप गूलर खाए।
उतर उतर परमेश्वरी तेरा मठा सिरानों जाए।।

भैंस चढ़ी बिटोरी और लप लप गूलर खाए।
उतर आ मेरे साँड की, कहीं हिफ्ज न फट जाए।।

उलटबाँसियाँ / अमीर खुसरो | Amir Khusro

उलटबाँसियाँ / अमीर खुसरो | Amir Khusro

Amir Khusro

भार भुजावन हम गए, पल्ले बाँधी ऊन
कुत्ता चरखा लै गयो, काएते फटकूँगी चून.

काकी फूफा घर में हैं कि नायं, नायं तो नन्देऊ
पांवरो होय तो ला दे, ला कथूरा में डोराई डारि लाऊँ.

खीर पकाई जतन से और चरखा दिया जलाय
आयो कुत्तो खा गयो, तू बैठी ढोल बजाय, ला पानी पिलाय.

भैंस चढ़ी बबूल पर और लपलप गूलर खाय
दुम उठा के देखा तो पूरनमासी के तीन दिन.

पीपल पकी पपेलियाँ, झड़ झड़ पड़े हैं बेर
सर में लगा खटाक से, वाह रे तेरी मिठास.

लखु आवे लखु जावे, बड़ो कर धम्मकला
पीपर तन की न मानूँ बरतन धधरया, बड़ो कर धम्मकला.

भैंस चढ़ी बबूल पर और लप लप गूलर खाए
उतर उतर परमेश्वरी तेरा मठा सिरानों जाए.

भैंस चढ़ी बिटोरी और लप लप गूलर खाए
उतर आ मेरे साँड की, कहीं हिफ्ज न फट जाए.

दुसुख़ने / अमीर खुसरो – Amir Khusro Kavita

दुसुख़ने / अमीर खुसरो – Amir Khusro Kavita

Amir Khusro Kavita

१.
गोश्त क्यों न खाया?
डोम क्यों न गाया?
उत्तर—गला न था

२.
जूता पहना नहीं
समोसा खाया नहीं
उत्तर— तला न था

३.
अनार क्यों न चखा?
वज़ीर क्यों न रखा?
उत्तर— दाना न था( अनार का दाना और दाना=बुद्धिमान)

४.
सौदागर चे मे बायद? (सौदागर को क्या चाहिए )
बूचे(बहरे) को क्या चाहिए?
उत्तर (दो कान भी, दुकान भी)

५.
तिश्नारा चे मे बायद? (प्यासे को क्या चाहिए)
मिलाप को क्या चाहिए
उत्तर—चाह (कुआँ भी और प्यार भी)

६.
शिकार ब चे मे बायद करद? ( शिकार किस चीज़ से करना चाहिए)
क़ुव्वते मग़्ज़ को क्या चाहिए? (दिमाग़ी ताक़त को बढ़ाने के लिए क्या चाहिए)
उत्तर— बा —दाम (जाल के साथ) और बादाम

७.
रोटी जली क्यों? घोडा अडा क्यों? पान सडा क्यों ?
उत्तर— फेरा न था

८.
पंडित प्यासा क्यों? गधा उदास क्यों ?
उत्तर— लोटा न था

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