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Gulzar Poems in Hindi | वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था

Gulzar Poems in Hindi | वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था

Gulzar Poems in Hindi

वो ख़त के पुरज़े उड़ा रहा था
हवाओं का रुख़ दिखा रहा था

कुछ और भी हो गया नुमायाँ
मैं अपना लिखा मिटा रहा था

उसी का इमान बदल गया है
कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था

वो एक दिन एक अजनबी को
मेरी कहानी सुना रहा था

वो उम्र कम कर रहा था मेरी
मैं साल अपने बढ़ा रहा था

Gulzar Poems in Hindi

 

Gulzar Poems in Hindi | शाम से आँख में नमी सी है

Gulzar Poems in Hindi | शाम से आँख में नमी सी है

Gulzar Poems in Hindi

शाम से आँख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है

दफ़्न कर दो हमें कि साँस मिले
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है

वक़्त रहता नहीं कहीं थमकर
इस की आदत भी आदमी सी है

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है

Gulzar Poems in Hindi

 

Gulzar Poems in Hindi | साँस लेना भी कैसी आदत है

Gulzar Poems in Hindi | साँस लेना भी कैसी आदत है

Gulzar Poems in Hindi

साँस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नहीं बदन में कहीं
कोई साया नहीं है आँखों में
पाँव बेहिस हैं, चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है
कितने बरसों से, कितनी सदियों से
जिये जाते हैं, जिये जाते हैं
आदतें भी अजीब होती हैं

Gulzar Poems in Hindi

 

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