Category: Gulzar Poems

Gulzar Poems in Hindi | किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से

Gulzar Poems in Hindi | किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से Gulzar Poems in Hindi किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से बड़ी हसरत से तकती हैं महीनों अब मुलाकातें नहीं होती जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर बड़ी बेचैन रहती […]

Gulzar Poems in Hindi | कुछ खो दिया है पाइके

Gulzar Poems in Hindi | कुछ खो दिया है पाइके Gulzar Poems in Hindi कुछ खो दिया है पाइके कुछ पा लिया गवाइके। कहाँ ले चला है मनवा मोहे बाँवरी बनाइके। Gulzar Poems in Hindi

Gulzar Poems in Hindi | एक में दो

Gulzar Poems in Hindi | एक में दो Gulzar Poems in Hindi एक शरीर में कितने दो हैं, गिन कर देखो जितने दो हैं। देखने वाली आँखें दो हैं, उनके ऊपर भवें भी दो हैं, सूँघते हैं ख़ुश्बू को जिससे नाक एक है, नथुने दो हैं। भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन, बोलने वाले होंठ तो दो […]

Gulzar Poems in Hindi | एक में दो

Gulzar Poems in Hindi | एक में दो Gulzar Poems in Hindi एक शरीर में कितने दो हैं, गिन कर देखो जितने दो हैं। देखने वाली आँखें दो हैं, उनके ऊपर भवें भी दो हैं, सूँघते हैं ख़ुश्बू को जिससे नाक एक है, नथुने दो हैं। भाषाएँ हैं सैकड़ों लेकिन, बोलने वाले होंठ तो दो […]

Gulzar Poems in Hindi | रिश्ते बस रिश्ते होते हैं

Gulzar Poems in Hindi | रिश्ते बस रिश्ते होते हैं Gulzar Poems in Hindi रिश्ते बस रिश्ते होते हैं कुछ इक पल के कुछ दो पल के कुछ परों से हल्के होते हैं बरसों के तले चलते-चलते भारी-भरकम हो जाते हैं कुछ भारी-भरकम बर्फ़ के-से बरसों के तले गलते-गलते हलके-फुलके हो जाते हैं नाम होते […]

Gulzar Poems in Hindi | खुमानी, अखरोट!

Gulzar Poems in Hindi | खुमानी, अखरोट! Gulzar Poems in Hindi ख़ुमानी, अख़रोट बहुत दिन पास रहे थे दोनों के जब अक़्स पड़ा करते थे बहते दरिया में, पेड़ों की पोशाकें छोड़के, नंग-धड़ंग दोनों दिन भर पानी में तैरा करते थे कभी-कभी तो पार का छोर भी छू आते थे ख़ुमानी मोटी थी और अख़रोट […]

Gulzar Poems in Hindi | अमलतास

Gulzar Poems in Hindi | अमलतास Gulzar Poems in Hindi खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था शाखें पंखों की तरह खोले हुए एक परिन्दे की तरह बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर सब सुनाते थे वि परवाज़ के क़िस्से उसको और दिखाते थे […]

Gulzar Poems in Hindi | आम

Gulzar Poems in Hindi | आम Gulzar Poems in Hindi मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी? मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूँ जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए परली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके जाने दुखती हुई किस शाख से मेरा […]

Gulzar Poems in Hindi | कुछ और मंजर-1

Gulzar Poems in Hindi | कुछ और मंजर-1 Gulzar Poems in Hindi कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का दबा के पैन्सिल को उंगलियों में मुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख के लिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो.. ख़याल होता है, गोर्की है! पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी […]

Gulzar Poems in Hindi | वैन गॉग का एक ख़त

Gulzar Poems in Hindi | वैन गॉग का एक ख़त Gulzar Poems in Hindi तारपीन तेल में कुछ घोली हुई धूप की डलियाँ मैंने कैनवास में बिख़ेरी थीं मगर क्या करूँ लोगों को उस धूप में रंग दिखते ही नहीं!   मुझसे कहता था थियो चर्च की सर्विस कर लूँ और उस गिरजे की ख़िदमत […]