Gulzar Poems in Hindi | ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ़हे पलटने का

Gulzar Poems in Hindi | ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ़हे पलटने का

Gulzar Poems in Hindi

ज़ुबान पर ज़ाएका आता था जो सफ़हे पलटने का
अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक
झपकी गुज़रती है
बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर
किताबों से जो जाती राब्ता था, कट गया है
कभी सीने पे रख के लेट जाते थे

Gulzar Poems in Hindi

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